प्रेम | Prem
Vivek Shukla
10:29 PM
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प्रेम | Premप्राणप्रिये तुम हो दीपक तम को हरने तुम आयी हो,इस काल ग्रसित व्यथित मन मे उजियारा करने आयी हो।तुम राधा सी निश्छल काया मुझमे कृष्ण सा प्रेम भरा,इस गीत रहित, निर्जीव अधर को मुरलीधर करने आयी हो।तुम चिर वर्षा मैं चातक पर मेघों का आभाव यहाँ,इक आशा, इस दुर्गम मरुथल पर बदरी बन कर छायी हो।तुम...